भारत का इस्पात क्षेत्र आत्मनिर्भरता की ओर अग्रसर 

पाठ्यक्रम: GS3/ अर्थव्यवस्था

संदर्भ

  • भारत ने 2018 से विश्व का दूसरा सबसे बड़ा इस्पात उत्पादक देश होने का स्थान बनाए रखा है, जिससे यह एक प्रतिस्पर्धी और विस्तारशील वैश्विक खिलाड़ी के रूप में अपनी स्थिति को सुदृढ़ करता है।

इस्पात के बारे में

  • इस्पात एक मिश्रधातु है जो मुख्यतः लोहे, कार्बन (< 2%) और मैंगनीज़ (1%) से बना होता है, साथ ही इसमें सिलिकॉन, फॉस्फोरस, सल्फर और ऑक्सीजन की थोड़ी मात्रा होती है।
  • इस्पात और लोहे के विभिन्न रूप इस्पात क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण हैं। इनमें से कुछ हैं:
    • कच्चा इस्पात : तरल इस्पात के ठोस होने पर बनने वाला प्रथम ठोस उत्पाद।
    • तैयार इस्पात : अर्ध-तैयार इस्पात के हॉट रोलिंग/फोर्जिंग से प्राप्त उत्पाद।
    • हॉट मेटल, पिग आयरन और स्पंज आयरन: लोहे के प्रमुख रूप जो इस्पात उद्योग की महत्वपूर्ण श्रेणियाँ हैं।

इस्पात क्षेत्र में भारत की वैश्विक स्थिति

  • भारत की वैश्विक कच्चे इस्पात उत्पादन में हिस्सेदारी 2014 में 5.2% से बढ़कर 2024 में 7.9% हो गई, जो इसकी बढ़ती वैश्विक प्रतिस्पर्धा को दर्शाती है।
  • वर्ल्ड स्टील एसोसिएशन के अनुसार, भारत तैयार इस्पात का विश्व का दूसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता भी है।
    • भारत में तैयार इस्पात की खपत 2014–15 में 77 मिलियन टन (MT) से बढ़कर 2025–26 में 163.7 MT हो गई।
  • मार्च 2026 में भारत के तैयार इस्पात निर्यात के शीर्ष गंतव्य वियतनाम, बेल्जियम और ताइवान थे, जो भारत के कुल निर्यात का 50% से अधिक थे।
  • भारत का लक्ष्य 2047 तक 500 MT इस्पात उत्पादन क्षमता प्राप्त करना है, जो दीर्घकालिक औद्योगिक विकास रणनीति का हिस्सा है।

भारत के लिए इस्पात क्षेत्र का महत्व

  • औद्योगिक विकास की रीढ़: इस्पात अवसंरचना, आवास, परिवहन, ऊर्जा, पूंजीगत वस्तुएँ और भारी उद्योग जैसे प्रमुख क्षेत्रों को समर्थन देता है तथा भारत के GDP में लगभग 2% का योगदान करता है।
  • रोज़गार वृद्धि: इस्पात उद्योग खनन, विनिर्माण, लॉजिस्टिक्स और सहायक उद्योगों में बड़े पैमाने पर प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रोज़गार उत्पन्न करता है।
  • राष्ट्रीय सुरक्षा महत्व: सुदृढ़ घरेलू इस्पात आधार रक्षा निर्माण, जहाज़ निर्माण, रेलवे और सामरिक अवसंरचना के लिए अत्यंत आवश्यक है।

इस्पात क्षेत्र को समर्थन देने वाले सरकारी सुधार

  • राष्ट्रीय इस्पात नीति 2017: इसका लक्ष्य 2030–31 तक कच्चे इस्पात क्षमता को 300 MTPA और उत्पादन को 255 MTPA तक बढ़ाना है।
  • साथ ही, प्रति व्यक्ति तैयार इस्पात खपत को वर्तमान 61 किलोग्राम से बढ़ाकर 158 किलोग्राम करना।
  • विशेष इस्पात हेतु उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजना: यह भारत की विनिर्माण क्षमता को सुदृढ़ करने हेतु कंपनियों को उनकी अतिरिक्त बिक्री पर वित्तीय प्रोत्साहन प्रदान करती है।
  • योजना FY 2024-25 से FY 2030-31 तक पाँच वर्षों के लिए प्रोत्साहन देती है।
  • विशेष इस्पात एक मूल्यवर्धित उत्पाद है जिसे उन्नत प्रसंस्करण तकनीकों से बनाया जाता है ताकि अधिक सुदृढ़ , टिकाऊपन, संक्षारण प्रतिरोध और प्रदर्शन मिले।
  • इस्पात ज़ोन की पहचान: सरकार 12 प्रमुख इस्पात ज़ोन में लॉजिस्टिक्स और अवसंरचना परियोजनाओं को तीव्रता से आगे बढ़ा रही है।
  • रेल, सड़क और बंदरगाह विस्तार प्राथमिकता पर हैं ताकि बाधाओं को दूर कर विश्वस्तरीय बहु-मॉडल संपर्क विकसित किया जा सके।
  • इस्पात स्क्रैप पुनर्चक्रण नीति (2019): घरेलू स्क्रैप की उपलब्धता बढ़ाने हेतु अधिसूचित।
    • अप्रैल 2025 में सरकार ने कुछ गैर-मिश्रधातु और मिश्रधातु इस्पात फ्लैट उत्पादों पर 12% सुरक्षा शुल्क लगाया। इससे घरेलू निर्माताओं को आयात वृद्धि से सुरक्षा मिलती है और निष्पक्ष बाज़ार प्रतिस्पर्धा बनी रहती है।

भारत के इस्पात क्षेत्र का डीकार्बोनाइजेशन

  • भारत इस्पात क्षेत्र का डीकार्बोनाइजेशन कर रहा है ताकि 2070 तक शुद्ध-शून्य उत्सर्जन तीव्रता लक्ष्य प्राप्त किया जा सके। इसके लिए ऊर्जा दक्षता, नवीकरणीय ऊर्जा अपनाना, ग्रीन हाइड्रोजन, स्क्रैप पुनर्चक्रण और कार्बन कैप्चर, उपयोग एवं भंडारण (CCUS) तकनीकों का प्रयोग किया जा रहा है।
  • 2024 में भारत ग्रीन स्टील टैक्सोनॉमी पेश करने वाला प्रथम देश बना, जिसमें ग्रीन स्टील को उस इस्पात के रूप में परिभाषित किया गया है जिसकी उत्सर्जन तीव्रता प्रति टन तैयार इस्पात पर 2.2 टन CO₂ समकक्ष से कम हो।
  • मार्च 2026 तक 89 इस्पात इकाइयों को ग्रीन स्टील प्रमाणन प्राप्त हुआ, जो 12.34 MT उत्पादन को कवर करता है।

आगे की राह

  • भारत का इस्पात क्षेत्र औद्योगिक विकास, अवसंरचना निर्माण और आर्थिक आत्मनिर्भरता का प्रमुख चालक बनकर उभरा है।
  • बढ़ती उत्पादन क्षमता, विस्तारित निर्यात, विशेष इस्पात पर ध्यान और ग्रीन स्टील व डीकार्बोनाइजेशन के प्रति प्रतिबद्धता के साथ यह क्षेत्र 2047 तक भारत को एक विकसित एवं सतत अर्थव्यवस्था बनाने की दृष्टि में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए तैयार है।

Source: AIR 

 

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